Sunday, July 7, 2019


पंढरपुर की  वारी

      वारी और वारकरी ये दो शब्द सुनते ही मन मे अध्यात्म एवं रोमांच का ऐसा ज्वार उमड़ता है कि कदम अपने आप  किसी को भी पंढरपुर की वारी का वारकरी बनने को उत्साहित करने लगते हैं। और इसी उत्साह के चलते भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से पताका-दिंडी लेकर इस तीर्थस्थल पर पदयात्रा  कर लोग यहां एकत्रित होते हैं।वैसे तो देश मे अनेक यात्राएं भिन्न -भिन्न भागों में सम्पन्न होती हैं जिनका हजारों वर्षों का अपना इतिहास है जिन्होंने अलग-अलग भौगोलिक-सांस्कृतिक  भू-भागों को जोड़ने का काम किया है।
पंढरपुर की वारीअर्थात पंढरपुर में विराजमान भगवान विठोबाजिन्हें विट्ठल भी कहा जाता है के दर्शन की यात्रा है जो पैदल की जाती है तथा लगभग 22 दिनों में  आषाढ़ एकादशी के दिन पूर्ण होती है और इस यात्रा में सम्मिलित होने वाले यात्री वारकरी कहलाते हैं। भीमा नदी जिसे चन्द्रभागा के नाम से भी जाना जाता है,के के तट पर बसा पंढरपुर शोलापुर जिले में स्थित है। आषाढ़ का महीना  भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए देश के विख्यात है इसी लिए इस तीर्थस्थल पर पैदल चल कर लोग यहां इकट्ठा होते हैं।
पंढरीनाथ की इस यात्रा की तासीर पढ़ने या देखने से नही बल्कि इसमें शामिल होकर ही समझी जा सकती है क्योंकि इसमें सम्मिलित  वारकरियों की संख्या आपकी कल्पना के बाहर होती है इसमें एक दो लाख नही बल्कि पांच से दस लाख लोग शामिल होते है।
यह यात्रा वस्तुतः एक धार्मिक यात्रा है जो कई स्थानों से प्रारम्भ होती है इनमे से अत्यंत महत्वपूर्ण एक यात्रा पुणे के समीप आळंदी से तथा दूसरी देहु से प्रारंभ होती है।और इन स्थानों का महत्व इस लिए भी है क्योंकि भक्त लोग आलंदी से महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर की तथा देहु से संत तुकाराम की पालकी के साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं। और जब  यात्रा के 21वें दिन दोनों पालकियों का एक ही स्थान पर संगम होता है और लाखों वारकरी एकत्रित होते हैं तो ऐसे विहंगम  दृश्य का केवल अनुमान ही किया जा सकता है जब लाखों लोग एक साथ जय हरि विट्ठला तथा  रुख्माई का जय घोष करते हैं। इसके अतिरिक्त भी इस यात्रा मे कतिपय धार्मिक मान्यता प्राप्त पालकियाँ सम्मिलित होती हैं जिनमे पैठण से संत एकनाथ की पालकी तथा  सेगाँव से गजानन्द महाराज की पालकी को अत्यधिक आदर और सम्मान प्राप्त है। यात्रामार्ग मे सुनिश्चित अंतराल पर इनका पड़ाव होता है जहां से अन्य पालकियाँ –दिँडी इसमे मिलती जाती हैं और कारवां बढ़ता जाता है और इसके बाद आयोजन होता है रिंगन का जिसमे घोड़ों के साथ पालकियों को लेकर भक्त लोग दौड़ते हैं जिसका अवलोकन करना अपने आप मे आकरशक एवं रोचक होता है।
पंढरपुर की इस यात्रा की विशेषता है, उसकी वारीवारीअर्थात  ‘लगातार यात्रा करना।’ इस यात्रा में प्रति वर्ष पीढ़ी दर पीढ़ी शामिल होने वाले लोगों को वारकरीकहा जाता है। महत्वपूर्ण यह है कि इसमे सम्मिलित होने वाले लोगों का समूह इतना व्यापक और विशाल हो गया कि यह एक पृथक संप्रदाय बनकर  वारकरी संप्रदायकहलाने लगा । इस वारीका जब से आरंभ हुआ है, तब से पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार के लोग हर साल वारी के लिए निकल पड़ते हैं। महाराष्ट्र में कई स्थानों पर वैष्णव संतों के निवास स्थान हैं या उनके समाधि स्थल हैं। ऐसे स्थानों से उन संतों की पालकी वारीके लिए प्रस्थान करती है। आषाढ़ी एकादशी के दिन पंढरपुर पहुंचने का उद्देश्य सामने रख कर, निश्चित अंतर के अनुसार हर पालकी का अपने सफर का कार्यक्रम तय होता है।
पालकी के साथ एक मुखिया होता है जिसकेमार्गदर्शन में समूह यानी दिंडी(कीर्तन/भजन मंडली) चलती है, जिसमें शामिल होते हैं वारकरी। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में ईश्वर के सगुण-निर्गुण और बहुदेव उपासना की विविधता एकता में पिरोने  का कार्य किया है वारकरी संप्रदाय ने।
प्रतिवर्ष यात्रा मे शामिल होने वाले वारकरी को  कितना यात्रा , किस मार्ग से कितनी देर में करनी है , कब और कहां रुकना है, कहां भोजन करना है, हर चीज का  समय सालों-साल पीढ़ियों से निर्धारित है। शायद ही कोई इसे भूलता हो , एक पीढ़ी दर पीढ़ी अपने आप जानकारियाँ दायित्व स्थानातरित होते रहते हैंप्रत्येक वारकरी एक दिंडी का सदस्य होता है, जिसका एक निश्चित नंबर व चलने का निर्धारित क्रम तय होता है और यहाँ पर स्वतः अनुशासन दिखाई देता है किसी को सीखने की जरूरत नहीं होती है।
हर दिंडी का एक मुखिया होता है, जिसके पास खर्च हेतु वारकरी एक सामान्य हाथ खर्च की राशि जमा कर देते हैं।स्योन के रोज़मर्रा के उपयोग की वस्तुओं के आवागमन हेतु  एक वाहन भी साथ मे  होता है, जिस पर मुखिया अगले ठिकाने पर पहले ही से पहुंच कर आवशयक प्रबंध करता है, यही उसकी वारी है। और जमा पैसे का सारा व्यवहार बिलकुल शीशे की तरह साफ पारदर्शी आज तक ऐसी कोई खबर सुनने मे नहीं आई की किसी दिंडी का मुखिया पैसे लेकर गायब हो गया हो।
एक दिंडी यानी लगभग 100-250 लोगों का ऐसा परिवार, जो हमेशा एक-दूसरे के संपर्क में रहता है। वारी के दौरान प्यार आत्मीयता के साथ लाया नाश्ता लड्डू-चकली, चिवड़ा एक-दूसरे को खिलाकर  खुश होते हैं।प्रत्येक वारकरी की एकमात्र अभिलाषा यही होती है कि प्रभु, हमें मोक्ष न देते हुए फिर से मानव जन्म ही देना ताकि हर जन्म में विट्ठल की भक्ति का मौका मिल सकें।  
वैसे तो पंढरपुर की वारी तथा  वारकरी संप्रदाय प्राचीनता के संदर्भ हजारों वर्षों का अनुमान किया जाता है परंतु तेरहवीं शताब्दी से ज्ञात  पुंडरीक की कहानी के आलोक मे  लगभग  आठ सौ वर्षों यह यात्रा अनवरत जारी है। अपने माता-पिता की सेवा मे रत पुंडरीक के आग्रह पर भगवान  श्री विट्ठल अपने भक्त की दहलीज पर प्रतीक्षा में कमर पर हाथ धरे एक ही ईट पर आज भी खड़े हैं क्योंकि  भक्त ने उन्हे अभी तक बैठने के लिए ही नहीं कहा। और जब तक  भगवान विट्ठोबा खड़े हैं तब तक दिंडी-वारी दर्शनों के लिए आती रहेंगी और पूरा महाराष्ट्र जय हरि विट्ठला और जय रुखमाई के जयघोष गुंजायमान होता रहेगा।






पुनः चर्चा मे है शारदा पीठ

             चुनावी गहमा-गहमी के बीच एक बड़ी खबर ये आई की पाकिस्तान करतारपुर साहिब जैसा ही कारीडोर शारदापीठ मंदिर की तीर्थयात्रा हेतु हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए बनाने के लिए सहमत हो गया है। तब से ही प्राचीन भारत का वर्तमान पाक अधिकृत काश्मीर मे स्थित यह महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र उत्सुकता एवं चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यदि सबकुछ ठीक–ठाक रहा तो कश्मीरी पंडितो के साथ-साथ अन्य हिन्दू धर्मावलम्बियों की भी लगभग पिछले 70 वर्षों से शारदापीठ जाने के लिए गलियारा बनाने लंबित मांग पूरी हो जाएगी। वस्तुतः सन 1947 मे पाकिस्तान बन जाने के बाद  शारदापीठ की यात्रा कठिन या फिर यूं कहे कि बंद हो गई गई थी। शारदा पीठ भारतीय नियंत्रण रेखा पर  भारत के कुपवाड़ा से तकरीबन 30 किमी दूर तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर स्थित मुज्फ़्फराबाद से लगभग 145 किमी  दूर नीलम नदी के किनारे शारदा गांव में स्थित है जहां पर अब मंदिर के नाम पर सिर्फ भग्नावशेष ही बचे हैं

   वैसे तो इस मंदिर कोई क्रमबद्ध लिखित इतिहास तो ज्ञात नहीं होता कि यह मंदिर कब अस्तित्व में आया किन्तु परंपरानुसार ज्ञान की देवी सरस्वती के इस मंदिर को 5000 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है है।  लेकिन उपलब्ध प्रमाणो के अनुसार मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान मंदिर के पास एक बौद्ध विश्वविद्यालय का जिक्र  मिलता है जो शारदा पीठ के रूप में जाना जाता था जिसका  उद्देश्य बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार  था।। और कतिपय विद्वानो ने तो यहीं पर चतुर्थ बौद्ध संगीति के आयोजन का भी उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त 11वीं सदी ई. में कश्मीर के इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत कल्हणकृत राजतरंगिणी (संस्कृत ग्रन्थ)तथा अकबर कालीन अबुलफजल द्वारा लिखी गई आइन-ए-अकबरी मे भी शारदा मंदिर का महत्वपूर्ण विवरण मिलता है।वैसे भी कश्मीरी पंडितों के लिए शारदा पीठ मंदिर, अमरनाथ,क्षीरभावनी और अनंतनाग स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर की तरह ही आस्था केंद्र रहा है और अनेक कश्मीरी पंडितों की तो यह कुलदेवी के रूप मे भी अधिष्ठित हैं।
      शारदा पीठ का महत्व इसलिए भी है कि यह देवी के 52 शक्तिपीठों में ही नहीं, बल्कि 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है जहां पर सती देवी का दायाँ हाथ गिरा था।  इसके साथ ही इसकी गणना भारत के प्राचीन महत्वपूर्ण  शिक्षा केन्द्रों, तक्षशिला, नालंदा,उज्जैन,वल्लभी, विक्रमशिला तथा वाराणसी मे कि जाती थी। शारदा पीठ के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की शैव संप्रदाय के उन्नायक कहे जाने वाले शंकराचार्य और वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य दोनों ही यहां आए थे और उन्होने यहाँ से महत्वपूर्ण ज्ञानार्जन किया था। चौदहवीं शताब्दी ई. तक कई बार यह मंदिर प्राकृतिक आपदाओं तथा विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा जिससे इसे काफी हानि पहुंची।
   ज्ञात जानकारी के अनुसार 19वीं सदी ई. में काश्मीर के महाराजा गुलाब सिं ने आखिरी बार इसका जीर्णोद्धार कराया था। बाद मे उपलब्ध मीडिया  रिपोर्टों के अनुसार सन 2005 में आए भूकंप में यह मंदिर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था किन्तु पाकिस्तान मे किसी ने इसकी ओर ध्यान नहीं दिया।परंतु अब ऐसा लगता है कि भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए शारदा पीठ यात्रा करने के लिए गलियारा बनने से इस प्राचीन धरोहर के संरक्षण और संवर्धन की दिशा मे भी जिम्मेदार संस्थाएं ध्यान देंगी जिससे शारदा पीठ के गौरवशाली अतीत से  भी दुनिया पुनः रूबरू हो सकेगी। हालांकि यह कहना तो जल्दबाज़ी होगी पर उम्मीद तो की ही जा सकती की शायद इन्ही प्रयासों से भारत-पाकिस्तान के संबंध पुनः पटरी पर आ जायें।





सिक्के की कहानी
                    
     मानव की उत्पत्ति एवं विकास के साथ ही उसकी आवश्यकताओं का भी उद्भव हुआ। प्रारंभिक पारिवारिक इकाई के साथ-साथ सामुदायिक कबीलों का स्वरूप भी विकास का प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। इसी प्रकार जब-जब भिन्न-भिन्न लोग परिवार तथा कबीले अलग-अलग सामुदायों के सम्पर्क में आए और उनकी परस्पर आवश्यकताएँ बढ़ने लगी तब विभिन्न वस्तुओं का आदान-प्रदान उनके लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई होगी और इसी पारस्परिक आदान-प्रदान कालांतर में व्यापार का स्वरूप भी धारण किया होगा। किसी एक वस्तु को लेकर सामने वाले से दूसरी वस्तु लेने की यह पारस्परिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया ही विनिमय कहलाती है। विनिमय की यह प्रथा ही भारतीय सिक्कों के जन्म के प्राथमिक सीढ़ी है।
विनिमय की प्रक्रिया में यह सामान्य नियम था कि लेने वाले और देने वाले की आवश्यकताएँ एक-दूसरे के अनुरूप हो ताकि वांछित वस्तुओं को एक-दूसरे के बदले में बदला जा सके। किन्तु अनेक बार यह संभव नहीं होता था। कुछ वस्तुएँ ऐसी भी होती थी जिन्हें ना तो काटा जा सकता था ना ही तोड़ा जा सकता था अर्थात् समूचे रूप में उनकी अदला-बदली (विनिमय) नहीं हो सकती थी। यदि किसी को आनाज के बदले आनाज चाहिए तो यह संभव था किन्तु कोई गाय के बदले हाथी या बकरी के बदले गाय अथवा अनाज के बदले हाथी आदि विनिमय करना चाहता था तो विनिमय पर अर्थात कितनी मात्रा के बदले इच्छित वस्तु प्रदान की जाए अथवा विभाजित की जाने जैसी व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न हो गई। इसी प्रकार की कठिनाईयों को दूर करने के लिए एक निश्चित वस्तु के माध्यम से आदान-प्रदान करने की बात सामने आयी और यह आदान-प्रदान परम्परा लम्बे समय तक दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में चलती रही।
        विकास के साथ-साथ किसी वस्तु का मूल्य कम और किसी का ज्यादा आंका जाने लगा होगा। इसी प्रकार ठोस एवं तरल वस्तुओं के मापन की इकाईयॉं भी बनने लगी। प्रागैतिहासिक युग में जब पत्थर के औजारों का बोल-बाला था तब सम्भव है कि वस्तुओं के बदले मांस-चमड़े तथा अश्मोपकरण याने की पत्थर के औज़ार उनके विनिमय का साधन रहे होंगे। पशुपालक समाज में उनके पशु, गाय, बैल, भेड़ आदि भी महत्वपूर्ण थे इसीलिए वे ही मूल्यावन इकाई बने।
 वैदिक साहित्य से यह प्रमाणित भी होता है कि गायों का विनिमय के रूप में प्रयोग किया जाता था। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण इन्द्र की  प्रतिमा को लेकर है जिसे एक व्यक्ति दस हजार गायों को देने पर भी बेचने को तैयार नहीं होता है। पशुओं को विनिमय की इकाई के रूप में प्रयोग करने पर अनेक समस्याएं सामने आयी क्योंकि उनका विनिमय मूल्य स्थिर नहीं होता था, दूध देना बंद करने पर, बीमार होने पर अथवा मृत्यु होने पर वे अमूल्य हो जाती थी और अपने से कम मूल्य वाली वस्तुओं से उनका विनिमय भी नहीं हो पाता था। विनिमय के रूप में धातुओं का प्रचलन कब कहॉं पर पहली बार हुआ यह निश्चित रूप से बता पाना संभव नहीं है किन्तु जैसे-जैसे विकास की प्रक्रिया बढ़ती गई मनुष्य ने धातुओं के महत्व पहचानना सीखा और धातुएँ उन्हें अधिक सुविधाजनक लगी होगी क्योंकि उन्हें वांछित आकार-प्रकार में काटना- ढालना आसान था साथ ही  फिर अलग-अलग धातुओं का मूल्य भी अलग-अलग था। किन्तु प्रायः उन्हीं धातुओं के सिक्के बनाए गए जो कि प्रमुखता से उपलब्ध थी। प्रायः सिक्कों के लिए तांबा, लोहा, जस्ता, सीसा, चांदी तथा सोने का प्रयोग किया गया। आरंभिक रूप में धातुओं को निश्चित वजन में तौलकर आदान-प्रदान करने के लिए एक इकाई की आवश्यकता हुई जिसमें कि निश्चित भार के साथ इसका मूल्य निर्धारित हो सके इसके लिए हमारे देश में बीजो का प्रयोग किया गया जिसे हम लोग रत्ती के नाम से जानते हैं। वैदिक साहित्य में यह कृष्णल के नाम से उल्लेखित हुआ है। इसके अतिरिक्त यव (जौ), तंदुल (चावल), माष (दाल) तथा कौड़ी आदि बीजों का जो पूर्व में विनिमय के रूप प्रयुक्त होते थे उनका कालान्तर में तौल के रूप में प्रयोग होने लगा। वर्तमान में भी तोला का प्रयोग भारमान तथा तराजू के रूप में तुला ही है।     
        वजन की इकाई निश्चित होने के बाद धातु खण्डों को भिन्न रूपों में धातु खंड, पत्र, छल्ले आदि के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। किन्तु इनकी शुद्धता तथा सर्वमान्यता संदहास्पद होने के कारण इनके प्रमाणीकरण की आवश्कता महसूस होने लगी इसलिए धातुखण्डों को निश्चित वजन के साथ लांछित (चिन्हीकरण) किया जाने लगा। इस प्रकार सिक्कों के विकास के तीन चरण दृष्टिगोचर होते हैं। प्रथम चरण वह जब विनिमय के रूप में धातुओं का आदान-प्रदान किया जाने लगा जिसे भारतीय साहित्य में पण्य/पण नाम से जाना जाता है। द्वितीय चरण में धातु के निश्चित वजन वाले गोल अथवा अन्य आकार प्रकार के धातु पिण्ड जिन्हें हिरण्य पिण्ड कहा गया। तृतीय और अंतिम चरण वह था जब धातुओं चिन्हांकित कर प्रचलन में लाया गया जिन्हें सिक्का (Coin) कहा जा सकता था।
        हमारे देश में आहत सिक्के प्राचीनतम भारतीय सिक्कों के रूप में स्वीकार किए जाते हैं जिनका प्रचलन लगभग छठवीं-सातवीं सदी ईस्वी पूर्व से सीकरा किया जाता है हालांकि कतिपय विद्वानों ने सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत मे सिक्कों के प्रचलन का मत भी व्यक्त किया है । किन्तु इसके पूर्व वैदिक साहित्य में उल्लिखित निष्क, हिरण्य आदि को भी मुद्रा के रूप में भी देखने की चेष्टा की जाती है।इसके अतिरिक्त बौद्ध साहित्य मे भी स्वयं भगवान बुद्ध के काल मे भी स्वर्ण मुद्राओं के व्यवहार का विवरण ज्ञात होता है।  आहत सिक्कों के प्रचलन से लेकर तांबे के ढालित सिक्के इण्डो-यूनानी सिक्के शक पहलव मौर्योत्तर सिक्कों से लेकर कुषाणकालीन, गुप्तकालीन तथा स्वर्ण, रजत- ताम्र मुद्रांए ना केवल भारतीय इतिहास की साक्षी है बल्कि उसमें एक पूर्वार विकास का क्रम दिखाई देता है।गुप्तोत्तर कालीन सिक्कों के अतिरिक्त सुदुर दक्षिण में भी यह परम्परा पायी जाती थी। इसी परम्परा का पालन सल्लतन कालीन शासकों तथा मुगलों ने भी किया। यह परम्परा स्वतंत्रा प्राप्ति तक निरंतर रूप से चलती रही जिसमे ब्रिटिश इंडिया के समय  जारी किए गए चाँदी के विक्टोरिया सिक्के कलनतर  कालांतर मे छल्ले वाले सिक्के तथा आज़ादी के बाद एक पैसा दो पैसा तथा पाँच और दस पैसे से लेकर एक आना, दो आना, चार आना (चवन्नी), अट्ठन्नी और सोलह आना याने की एक रूपये तक के विकास की कहानी यात्रा अत्यंत रोचक है। और इनमे से कतिपय सिक्के आज भी प्रचालन मे हैं आज भी जारी किए जाते हैं। हां ! यह अवश्य है कि विकास की प्रक्रिया के चलते अब हम ए.टी.एम कार्ड याने कि प्लास्टिक मनी का प्रयोग करने लगे हैं।
अतः उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश प्रायः विद्वानों द्वारा यह स्वीकार किया जाता है कि हमारे देश में विनिमय के रूप में धातु का प्रचलन लगभग 1000 ई.पू. तथा सिक्कों का उद्भव एवं विकास लगभग 700 ई.पू. में ही प्रारंभ हो गया था।




नीलाम होती भारतीय धरोहरें


     अभी कुछ दिनो पहले ही हैदराबाद के निज़ाम के आभूषणो की नीलामी की खबर मीडिया की सुर्खियां बनी थी किन्तु ये पहली बार नहीं हो रहा है कि जब विदेशी नीलामघरों द्वारा भारतीय धरोहरों की नीलामी की गई। इसके पूर्व भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कि घड़ी एवं चश्मा तथा टीपू सुल्तान की तलवार आदि भी इसी प्रकार नीलाम की जा चुकी हैं। हालांकि ये बहुमूल्य भारतीय ऐतिहासिक धरोहरें किस प्रकार नीलमघरों तक पहुँचती है इसकी तहक़ीक़ात करना तो सरकारों का काम है किन्तु जब इस प्रकार की खबरें आती हैं तो लोगों मे स्वाभाविक रूप से चिंता होती है और यही बात हमें अपनी धरोहरों के और करीब ले जाती है।
ताजा मामला, अमेरिका के न्‍यूयॉर्क शहर में क्रिस्‍टी नीलामघर द्वारा 19 जून बुधवार को हुई, भारतीय राजाओं/नवाबों  के आभूषणों की नीलामी से जुड़ा है। इस नीलामी में खास आकर्षण का केंद्र रही हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्‍मान अली खान की बेहद खास अंगूठी जो की रिंग मिरर ऑफ पैराडाइज के नाम से प्रसिद्ध थी जिसमे गोलकुंडा की विश्‍व‍ प्रसिद्ध हीरा खदान से निकला 52.58 कैरट का हीरा जड़ा था।  नीलामी में यह डॉयमंड रिंग 45 करोड़ रुपये मे बिक गई।इसके अतिरिक्त निज़ाम के खजाने का कभी खास हिस्सा रहा उनका 33 हीरों से बना हार 17 करोड़ रुपये मे तथा विभिन्न राजकीय समारोहों पर उपयोग मे आने वाली उनकी प्रिय तलवार भी 13.4 करोड़ रुपये में नीलाम हो गई।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैसे तो इस पूरी नीलामी कुल 400 वस्तुएं थीं जिसमे कुछ मुगलकालीन वस्तुएं, हुक्का तथा शाहजहाँ की कटार आदि, भी शामिल थी किन्तु  सबकी नज़र हैदराबाद के नवाब की नायाब चीजों पर थी। आजादी के पहले भारत की प्रमुख रियासतों मे से एक हैदराबाद के निज़ाम कभी दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति के रूप मे प्रसिद्ध थे और इनका खजाना पूरी दुनिया के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ था।  और आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि इस अकूत खजाने के मालिक हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली को सन 1937 ई. (फरवरी माह) मे टाईम मैगजीन ने दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया था ।
हैदराबाद के आखिरी निजाम का खजाना तो बाद मे भारत सरकार द्वारा धरोहर के रूप मे अधिगृहीत कर लिया गया और वर्तमान मे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आधिपत्य मे है । इस खजाने को केवल तीन  बार ही प्रदर्शनी के लिए रखा गया है। एक बार सन 2001मे  राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली मे तथा फिर 2006 में निजाम के आभूषणो को सालार जंग म्यूजियम और पुनः अभी इसी वर्ष राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में कुछ समय के लिए प्रदर्शनी के रूप मे रखा गया था। और यह खजाना मात्र खजाना नहीं है बल्कि इसमे सम्मिलित आभूषण,जवाहरात तथा अस्त्र-शस्त्र आदि भारतीय कला और तत्कालीन इतिहास का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
किन्तु बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि ये तो खजाने का वह हिस्सा है कि सभी को ज्ञात है इसके अतिरिक्त भी चोरी–चोरी,चुपके–चुपके खजाने के अनेक महत्वपूर्ण गहने-जवाहरात, बेशकीमती अस्त्र-शस्त्र आदि दुनिया के अनेक हिस्सों मे पहुँच गए और इनकी जानकारी हमे तब मिलती है जब ये किसी अंतरराष्ट्रीय नीलामघर द्वारा बेंची जाती है। जैसे अभी हाल ही निज़ाम के कुछ महत्वपूर्ण आभूषण आदि क्रिस्टी नीलामघर न्यूयार्क द्वारा नीलम किए गए।
 न्यूयार्क स्थित नीलामी संस्‍था क्रिस्‍टी के आधिकारिक बयान मे कहा गया कि भारतीय कला और मुगल वस्‍तुओं की अब तक की सबसे बड़ी संख्‍या 400 वस्तुओं नीलामी की गई जिसमे लगभग 758 करोड़ रुपये प्राप्त हुयेयद्यपि इस प्रकार की  नीलामियों को कानूनन किस प्रकार रोका जा सकता है यह तो विधि विशेषज्ञ ही बता सकते हैं किन्तु वैश्विक धरोहर सुरक्षा संबंधी कानूनों के अंतर्गत यदि किसी देश/संस्था/व्यक्ति का मालिकाना हक प्रमाणित होता है और वह किसी अवैध तरीके से उस देश से लायी गई है तो उसे चुनौती दी जा सकती है।  हालांकि धरोहरों के नाम पर हो रही इतिहास की इन नीलामियों पर भविष्य मे कभी प्रतिबंध संभव होगा की नहीं कहा नहीं जा सकता परंतु उम्मीद तो की ही जा सकती है भविष्य मे सरकारें अवश्य समुचित कदम उठायेंगी।


Wednesday, February 13, 2013

वेलेण्टाइन डे बनाम भारतीय प्रेम

इतिहासगत अनेक मत-मतान्तर के बावजूद यह स्वीकार किया जाता है कि रोमन सन्त वेलेण्टाइन ने, तीसरी शताब्दी ई. में रोम के शासक क्लाउडियस द्वितीय द्वारा प्रेमीयुगलों के विवाह आदि पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के बावजूद भी उन्हें शरण दी थी, उनकी रक्षा की थी। फलस्वरूप उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। कालान्तर में उनके इस बलिदान को स्मरण करने के लिए उनके नाम पर वेलेण्टाइन डे मनाया जाने लगा। पश्चिम से आयातित और वर्तमान में लगभग पूरी दुनिया में प्रेम दिवस के रूप में धूम मचाने वाले इस त्यौहार का यही संक्षिप्त इतिहास है।

आज से दो दशक पूर्व वेलेन्टाइन डे की आहट भारत में सुनाई दी फिर धीरे-धीरे प्रचार माध्यमों ने इसे प्रसारित किया। बाजार ने इस अवसर पर विशेष रियायतें घोषित की, कतिपय चैनलों ने वेलेन्टाइन डे की कहानियां तथा विशिष्ट प्रेम संदेशों की पटि्‌टयां चलाये जाने का कार्य प्रारंभ कर दिया, और उन पर भी इनामी राशि, गिफ्ट वाउचर आदि दिए जाने लगे। होटलों, रेस्टोरेंट में वेलेन्टाइन शामें आयोजित होने लगी और तो और कुछ अखबारों ने भी इस अवसर को भुनाने या यूं कहे अति आधुनिक दिखने के प्रयास में वेलेन्टाइन डे पर प्रेम संदेशों का प्रकाशन ही शुरू कर दिया। बाजार और प्रचार-प्रसार के गठजोड़ ने वेलेन्टाइन डे का ऐसा आभा मण्डल निर्मित कर दिया कि पश्चिम जैसी स्वच्छन्दता की आकांक्षा के चलते वेलेण्टाइन डे को शहरी युवा वर्ग ने हाथों-हाथ लिया और कुछ ही समय में इसका अखिल भारतीय नगरीय संस्करण तैयार हो गया। किन्तु इस स्वच्छन्दता ने परम्परागत भारतीय संस्कारों एवं शालीनता की सीमाओं को तिरोहित कर दिया। और इस दिवस पर रेस्तराओं, समुद्र तटों तथा उद्यानों में प्रेम का सार्वजनिक उन्मुक्त प्रदर्शन शुरू हो गया। वेलेण्टाइन डे के आयोजन से ज्यादा उसमें आ रही विकृतियों, विशेषकर स्वच्छंदता के नाम पर उच्‍छृंखलता के कारण इसका विरोध करने वाला एक वर्ग भी खड़ा हो गया। किन्तु विरोध के इन स्वरों ने इसको और अधिक प्रचार-प्रसार का अवसर उपलब्ध करा दिया। सबसे रोचक तथ्य तो यह है कि यह बयार शहरों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि अब तो कस्बानुमा गांवों में भी लुका छिपी वाले वेलेन्टाइन डे मनाए जाने लगे हैं।

वेलेण्टाइन डे प्रेम को अभिव्यक्त करने का एकमात्र दिवस है ऐसा नहीं है, बसंतोत्सव तथा मदनोत्सव जैसे पारम्परिक त्यौहार भी प्रेम को समर्पित त्यौहार हैं। किन्तु भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रेम का क्षितिज इससे कहीं व्यापक दिखाई देता है। भारतीय प्रेम समर्पण की कहानी है, बलिदान की गाथा है और त्याग का समुच्चय है। जब हम इतिहास की तारीखों को पलटते हैं तो उसमें प्रेम की ऐसी अनुपम घटनाएं दर्ज मिलती है जिनका कहीं और मिलना मुश्किल है। हमारे यहां सावित्री इसी प्रेम के चलते यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले आती है। राजा नल और दमयन्ती की प्रेम कहानी पर आज भी ढेरों लोकगीत मिल जाते है। सम्राट दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम पर बेजोड़ महाकाव्य अभिज्ञान शाकुन्तलम की रचना कर कालिदास विश्व साहित्य में अमर हो जाते हैं। यह उदाहरण तो एक बानगी मात्र हैं। हमारे इतिहास में ऐसी अनगिनत घटनाएं है जो भारतीय प्रेम को एक ऐसे उच्चतम शिखर पर स्थापित करती है जो कि प्रेम का एक मानक बिन्दु बन जाता है।

मुगल सुल्तान शाहजहां अपनी प्रिय रानी की याद में ताजमहल जैसी नायाब इमारत तामीर करा देते हैं। जो दुनिया के सात अजूबों में से एक बन जाती है और आज भी प्रेम के शाश्वत प्रतीक के रूप में पूरी दुनिया उसका उदाहरण देती है। इसी प्रेम की वशीभूत हो मीरा भगवान कृष्ण से प्रेम करते-करते विषपान कर जाती है और इसे समर्पण की पराकाष्ठा ही कहेंगे कि वह विष भी अमृत में परिवर्तित हो जाता है। ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर गूजरी रानी मृगनयनी के लिए ग्वालियर दुर्ग में गूजरी महल जैसा रनिवास खड़ा कर देते है। माण्डू के सुल्तान बाजबहादुर अपनी प्रेयसी रानी रूपमती के प्रेम में बावरे होकर माण्डू में ऐसे बुर्ज का निर्माण कराते हैं जहां से वह प्रतिदिन मां नर्मदा के दर्शन करने के बाद ही अन्य कार्य करती थी। क्या कोई किसी और के पुत्र को इतना प्रेम कर सकता है? कि उसके लिए अपने पुत्र का बलिदान कर दे। शायद नहीं किन्तु भारतीय इतिहास में पन्ना धाय द्वारा अपने स्वामी के पुत्र की प्राणों की रक्षा हेतु अपने ही बेटे को न्योछावर कर देने की रोंगटे खड़ी कर देने वाली बलिदान गाथा भी दर्ज है।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाजारीकरण एवं विदेशी संस्थागत राशि की आमद ने अलग-अलग अवसरों पर बाजार गढ़ने का जो स्वरूप तैयार किया है उसमें वेलेण्टाइन डे एक महत्वपूर्ण बाजार बनकर उभरा है और बाजारीकरण ने ना केवल भारतीय प्रेम की शाश्वत परिभाषा को बदलकर रख दिया बल्कि एक सन्त के बलिदान दिवस को चाकलेटी प्रेम के उन्मुक्त और स्वछन्द दिवस के रूप में बदल डाला।

Tuesday, January 29, 2013

छत्तीसगढ़ की मूर्ति एवं स्थापत्य कला-समसामायिक विमर्श

प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व की पढ़ाई-लिखाई करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ यानी प्राचीन दक्षिण कोसल। जिसकी तत्कालीन भौगोलिक सीमा में आज के उड़ीसा प्रान्त में सम्मिलित सम्बलपुर तक का हिस्सा आता था। राज्यों के पुर्नगठन ने जोंक नदी को उत्तर-पूर्व दिशा में छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा के मध्य एक भौगोलिक विभाजक रेखा के रूप में स्थापित कर दिया है अन्यथा खरियार के साथ-साथ वहां के राजा का छत्तीसगढ़ की राजनीति में क्या स्थान था उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। ब्रिटिश कालीन भारत में रायपुर में राजकुमार कालेज (आर.के.सी.) की स्थापना में राजा खरियार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भले ही वह अभिजात्य वर्ग की शिक्षा को केन्द्र में रखकर स्थापित किया गया था। किन्तु आज भी वह गौरवशाली अतीत के साथ साम्राज्यवादी भवन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।

जब हम लोग इतिहास और पुरातत्व की चर्चा करते हैं तो उसके अनेक आयाम सामने आते है। उनमें भी प्राचीन देवालयों उनमें भीतरी और बाहरी हिस्सों में स्थापित प्रतिमाओं प्रासाद तथा गुफाओंकी निर्माण शैली पर प्रायः गंभीर विमर्श नहीं हो पाता है। अभी हाल ही में जनवरी को संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मध्य भारत की कला एवं स्थापत्य (दक्षिण कोसल के विशेष संदर्भ में)विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस उम्दा आयोजन में जैसा कि होता है देश के कोने-कोने से विषय-विशेषज्ञ आए और उन्होंने अपना पर्चा भी पढ़ा।

इस संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण यह था कि कृष्णदेव, मधुसुदन आमीलाल ढाकी, प्रमोदचन्द्र जैसे विद्वानों कला-इतिहासकारो की परम्परा के संवाहक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कला के पक्ष को लोगों के सामने रखने वाले प्रो. रमानाथ मिश्र का आधार वक्तव्य। वस्तुतः यह आधार वक्तव्यय उस गंभीर विमर्श की ओर संकेत करता है जिसकी ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया है। वह है छत्तीसगढ़ में कलाकेन्द्रों का उद्‌भव क्या तपोवन के समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ दूसरा कि क्या छत्तीसगढ़ में उपलब्ध मूर्तिकला का उद्‌भव एवं विकास बिना किसी विदेशी प्रभाव के स्थानीय स्तर पर हुआ मल्हार में प्राप्त चतुर्भुजी अभिलिखित विष्णु प्रतिमा के निर्माण में रोमन प्रभाव को देखने की चेष्टा के साथ-साथ उसके निर्माण में भी नामक रोमन महिला का उल्लेख भी स्थानीय विद्वानों को उद्वेलित कर गया। अभी तक हम सभी लोग इस प्रतिमा को दक्षिण कोसल की कला के प्रतिमान के रूप में प्राथमिक उदाहरण के रूप में देखते थे। मल्हार के समीपवर्ती क्षेत्रों में मिलने वाले रोमन सिक्कों को भी इसी से जोड़कर देखे जाने का आग्रह भी एक तर्क के रूप में रखा गया। इतिहास में सहमति-असहमति की गुंजाइश हमेशा रहती है इसलिए प्रो. मिश्र के वक्तव्य से सहमत होना अपरिहार्य नहीं है। किन्तु उनके द्वारा उठाए गए बिन्दुओं पर विमर्श आवश्यक है। वैसे भी प्राचीन इतिहास के हम जैसे विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए यह हमेशा से अप्रियकर रहा है कि हमारे आराध्य देवों विष्णु एवं शिव का अंकन विदेशी शासकों ने पहली बार किया। इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में स्थित हेलियोडोरस गरूड़ध्वज स्तंभ भी तक्षशिला से आने वाले यवन दूत हेलियाडोरस द्वारा स्थापित कराया गया था। वर्तमान में उसे खाम बाबा के नाम से पूजा जाता है। किन्तु विदेशियों द्वारा हमारे धर्मों को आत्मसात कराना हमारी कमजोरी नहीं है बल्कि हमारी धार्मिक सम्पन्नता का उदाहरण है कि तत्कालीन समय में वैष्णव एवं शैव पंथ इतने प्रभावी थे कि विदेशी आगतो ने भी ना केवल इसका प्रचार-प्रसार किया बल्कि अपने अभिलेखों एवं मुद्राओं का वर्ण्य विषय भी बनाया।

वस्तुतः कई बार इस प्रकार के विवेचन में इतिहास का अनेक खॉंचों में विभाजित होना भी कठिनाई उत्पन्न करता है। क्योंकि वहॉं पर तथ्य का विवेचन एक विशिष्ठ मानसिकता के साथ होता है। हमारा प्रारंभिक इतिहास तो वैसे भी विदेशी अध्येताओं द्वारा कलमबद्ध किया गया है। छत्तीसगढ़ के इतिहास को भी प्रारंभिक रूप में अलेक्जेण्डर कनिघम जे.डी.बेलगर लॉन्गहर्स्ट आदि ने विवेचित किया है। किन्तु कालान्तर में पं.लोचन प्रसाद पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को अत्यन्त महत्वपूर्ण ढंग से रेखांकित किया।

कलात्मक पक्ष की विवेचना में दक्षिण कोसलीय प्रभाव की बहुलता तथा उत्पत्ति विषयक और सबल प्रमाणों को जुटाने का प्रयास हमें करना चाहिए ताकि समग्र रूप में हम भी दक्षिण कोसल की कला एवं स्थापत्य को स्थानीयता के साथ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सकें।


अजंता गुफाओं की पुनःखोज के 200 वर्ष                             हाँ , अप्रैल का ही महीना था और साल था 1819 , जब ब्रिटिश भारतीय स...