Tuesday, January 29, 2013

छत्तीसगढ़ की मूर्ति एवं स्थापत्य कला-समसामायिक विमर्श

प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व की पढ़ाई-लिखाई करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ यानी प्राचीन दक्षिण कोसल। जिसकी तत्कालीन भौगोलिक सीमा में आज के उड़ीसा प्रान्त में सम्मिलित सम्बलपुर तक का हिस्सा आता था। राज्यों के पुर्नगठन ने जोंक नदी को उत्तर-पूर्व दिशा में छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा के मध्य एक भौगोलिक विभाजक रेखा के रूप में स्थापित कर दिया है अन्यथा खरियार के साथ-साथ वहां के राजा का छत्तीसगढ़ की राजनीति में क्या स्थान था उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। ब्रिटिश कालीन भारत में रायपुर में राजकुमार कालेज (आर.के.सी.) की स्थापना में राजा खरियार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भले ही वह अभिजात्य वर्ग की शिक्षा को केन्द्र में रखकर स्थापित किया गया था। किन्तु आज भी वह गौरवशाली अतीत के साथ साम्राज्यवादी भवन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।

जब हम लोग इतिहास और पुरातत्व की चर्चा करते हैं तो उसके अनेक आयाम सामने आते है। उनमें भी प्राचीन देवालयों उनमें भीतरी और बाहरी हिस्सों में स्थापित प्रतिमाओं प्रासाद तथा गुफाओंकी निर्माण शैली पर प्रायः गंभीर विमर्श नहीं हो पाता है। अभी हाल ही में जनवरी को संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मध्य भारत की कला एवं स्थापत्य (दक्षिण कोसल के विशेष संदर्भ में)विषय पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस उम्दा आयोजन में जैसा कि होता है देश के कोने-कोने से विषय-विशेषज्ञ आए और उन्होंने अपना पर्चा भी पढ़ा।

इस संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण यह था कि कृष्णदेव, मधुसुदन आमीलाल ढाकी, प्रमोदचन्द्र जैसे विद्वानों कला-इतिहासकारो की परम्परा के संवाहक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय कला के पक्ष को लोगों के सामने रखने वाले प्रो. रमानाथ मिश्र का आधार वक्तव्य। वस्तुतः यह आधार वक्तव्यय उस गंभीर विमर्श की ओर संकेत करता है जिसकी ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया है। वह है छत्तीसगढ़ में कलाकेन्द्रों का उद्‌भव क्या तपोवन के समीपवर्ती क्षेत्रों में हुआ दूसरा कि क्या छत्तीसगढ़ में उपलब्ध मूर्तिकला का उद्‌भव एवं विकास बिना किसी विदेशी प्रभाव के स्थानीय स्तर पर हुआ मल्हार में प्राप्त चतुर्भुजी अभिलिखित विष्णु प्रतिमा के निर्माण में रोमन प्रभाव को देखने की चेष्टा के साथ-साथ उसके निर्माण में भी नामक रोमन महिला का उल्लेख भी स्थानीय विद्वानों को उद्वेलित कर गया। अभी तक हम सभी लोग इस प्रतिमा को दक्षिण कोसल की कला के प्रतिमान के रूप में प्राथमिक उदाहरण के रूप में देखते थे। मल्हार के समीपवर्ती क्षेत्रों में मिलने वाले रोमन सिक्कों को भी इसी से जोड़कर देखे जाने का आग्रह भी एक तर्क के रूप में रखा गया। इतिहास में सहमति-असहमति की गुंजाइश हमेशा रहती है इसलिए प्रो. मिश्र के वक्तव्य से सहमत होना अपरिहार्य नहीं है। किन्तु उनके द्वारा उठाए गए बिन्दुओं पर विमर्श आवश्यक है। वैसे भी प्राचीन इतिहास के हम जैसे विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए यह हमेशा से अप्रियकर रहा है कि हमारे आराध्य देवों विष्णु एवं शिव का अंकन विदेशी शासकों ने पहली बार किया। इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में स्थित हेलियोडोरस गरूड़ध्वज स्तंभ भी तक्षशिला से आने वाले यवन दूत हेलियाडोरस द्वारा स्थापित कराया गया था। वर्तमान में उसे खाम बाबा के नाम से पूजा जाता है। किन्तु विदेशियों द्वारा हमारे धर्मों को आत्मसात कराना हमारी कमजोरी नहीं है बल्कि हमारी धार्मिक सम्पन्नता का उदाहरण है कि तत्कालीन समय में वैष्णव एवं शैव पंथ इतने प्रभावी थे कि विदेशी आगतो ने भी ना केवल इसका प्रचार-प्रसार किया बल्कि अपने अभिलेखों एवं मुद्राओं का वर्ण्य विषय भी बनाया।

वस्तुतः कई बार इस प्रकार के विवेचन में इतिहास का अनेक खॉंचों में विभाजित होना भी कठिनाई उत्पन्न करता है। क्योंकि वहॉं पर तथ्य का विवेचन एक विशिष्ठ मानसिकता के साथ होता है। हमारा प्रारंभिक इतिहास तो वैसे भी विदेशी अध्येताओं द्वारा कलमबद्ध किया गया है। छत्तीसगढ़ के इतिहास को भी प्रारंभिक रूप में अलेक्जेण्डर कनिघम जे.डी.बेलगर लॉन्गहर्स्ट आदि ने विवेचित किया है। किन्तु कालान्तर में पं.लोचन प्रसाद पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को अत्यन्त महत्वपूर्ण ढंग से रेखांकित किया।

कलात्मक पक्ष की विवेचना में दक्षिण कोसलीय प्रभाव की बहुलता तथा उत्पत्ति विषयक और सबल प्रमाणों को जुटाने का प्रयास हमें करना चाहिए ताकि समग्र रूप में हम भी दक्षिण कोसल की कला एवं स्थापत्य को स्थानीयता के साथ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सकें।


3 comments:

  1. ब्लॉग जगत में स्वागत है देव। आशा है कि आप अपने लेखन से ब्लॉग जगत को समृद्ध करेगें।

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  2. सूचनाप्रद प्रतिवेदन और बढि़या प्रस्‍तुति.

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  3. हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है.

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